kabutar ka ghar

Laghu Katha Lekhan

लघु कथा – कबूतर का घर और टूटी दीवार

अलसाई आँखों को खोलते ही कबूतरी ने चौंक कर कबूतर से पूछा-

 

“जानू, ये रात ही रात में क्या हो गया पूरा भवन ही खंडहर हो गया। बस ये दो दीवारें ही बची, अब किस रोशन दान में अपना आशियाँ बनायेंगे?”

 

“इंसानी धर्मों का बुलडोजर चल गया है जानू – इस पर बस ये दो दीवारें जो बची, वो भी बंट गई हैं। हम इस दीवार पर बैठेंगे तो उसकी गोली चलेगी, उस पर बैठेंगे तो इस की गोली चलेगी। चल कहीं दूर उड़ चलें, जहाँ जाति धर्म वर्ण वर्ग भेदभाव न हो ” कबूतर ने कहा।

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“ऐसी कौन सी जगह होगी जानू यहाँ”?

 

“चल मुन्नी बाई के कोठे की छत पर गुटरगूँ करेंगे, सुना है वहाँ धर्म वर्म का कोई चक्कर नहीं है। वहीँ अपना आशियाना बनाएँगे”।

By राजेश कुमारी 'राज'

साझा काव्य सँग्रह -50 के लगभग, विभिन्न पत्र पत्रिकाओँ में सतत लेखन, आकाशवाणी नजीबाबाद से काव्य पाठ, दूरदर्शन देहरादून से काव्य पाठ अंतर्राष्टीय ब्लॉगर सम्मेलन में प्रथम आने पर तस्लीम सम्मान लखनऊ, अंतराष्ट्रीय हिंदी उत्सव सम्मान पोर्ट लुई मॉरीशस में, इस्राइल की भारतीय एम्बेसी व भारतीय सँस्कृति कोष में इनकी तीन पुस्तकें शामिल

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