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जिसने मुझे उंगली पकड़ चलना सिखाया,
जिसने बचपन से ख्वाब दिखा 

ऊंचा उड़ना सिखाया,
जिन्होंने रोते हुए मुझे हंसाया
उन्हें मै पिता कहता हूं।

जो हमेशा मेरी राहों को आसान
बनाने में लगे रहते हैं,
जो रेहनुमा बन मुझे राह दिखाते हैं,
जो हमेशा इस डर में जीते हैं…
कि गिर न जाऊं कहीं मै,
जो रोते हुए भी अपने आँसू छिपाते हैं
कि कमजोर न हो जाऊं कहीं मै,
उन्हें मै पिता कहता हूं।

जिन्हे ये उम्मीद रहती है
कि मै जो करूं
उससे घर में सब खुश रहें,
वो हर संभव प्रयास इसीलिए करते हैं
ताकि मेरा प्रयास असफल ना हो,
जो खुद भूखे रह मुझे खिलाते हैं,
उन्हें मै पिता कहता हूं।

जो सर पर हाथ रख
अपने होने का एहसास दिलाते हैं,
जो खाली जेब भी हो
हमे मेला दिखाते हैं,
जिन्हे मैं इन शब्दों
में बुनने की कोशिश कर रहा हूं,
कितना मूर्ख हूं मै भी,
जो मुझमें रहते हैं
जिनमे मै रहता हूं
उनके लिए क्या और कितना लिखूं।

जिनकी बात कहते लिखते
स्याही ख़तम हो जाये
उन्हें मै पिता कहता हूं।

 

Poem on Father in Hindi

By Udbhav Sinha

छात्र | नवोदित रचनाकार

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