martand sun temple

कार्कोट राजवंश के हिन्दू कायस्थ सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड ने बनवाया था मार्तंड सूर्य मंदिर Martand Sun Temple

कश्मीर में 7वीं से 8वीं शताब्दी के मध्य जब कार्कोट राजवंश के हिन्दू कायस्थ सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड का शासन था, तब कश्मीर में बड़े स्तर पर मंदिरों का निर्माण हुआ और प्राचीन मंदिरों की रूपरेखा बदली गई। दक्षिण कश्मीर का मार्तंड मंदिर, जिसे सूर्य मंदिर भी कहते हैं, उसका निर्माण भी इसी समय में हुआ था। राजा ललितादित्य ने इस मंदिर का निर्माण एक छोटे से शहर अनंतनाग के पास एक पठार के ऊपर किया था। इसकी गणना ललितादित्य के प्रमुख कार्यों में की जाती है। इसमें 84 स्तंभ हैं जो नियमित अंतराल पर रखे गए हैं।

हालांकि जिस जगह मंदिर बनाया गया, वहां पहले से सूर्यदेव की पूजा अर्चना होती थी। मार्तंड सूर्य मंदिर का प्रांगण 220 फुट से 142 फुट में फैला हुआ है। इस मंदिर की लंबाई 60 फुट और चौड़ाई 38 फुट है। द्वारमंडप तथा मंदिर के स्तम्भों की वास्तु-शैली रोम की डोरिक शैली से कुछ अंशों में मिलती-जुलती है। मार्तण्ड मंदिर अपनी वास्तुकला के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है।

यह मंदिर कश्मीरी हिंदू राजाओं की स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है। कश्मीर का यह मंदिर वहां की निर्माण शैली को व्यक्त करता है। इसके स्तंभों में ग्रीक सरंचना का इस्तेमाल भी करा गया है।

कायस्थ सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड के मार्तंड सूर्य मंदिर को कैसे बना दिया गया शैतान की गुफा

कश्मीर की चर्चा हाल के दिनों में विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) के कारण हो रही है। न केवल वहां पर कश्मीरी पंडितों पर हुए जुल्म की बातें जगजाहिर हो रही है बल्कि कश्मीर के ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट किये जाने से भी लोग बहुत आहत हैं।

कुछ वर्ष पूर्व एक और फिल्म आयी थी – हैदर। शाहिद कपूर के मुख्य किरदार वाली फिल्म ‘हैदर’ के गाने ‘बिस्मिल’ को मार्तंड सूर्य मंदिर में ही फिल्माया गया है। इसमें शाहिद कपूर डरावनी वेशभूषा में डांस करते हैं। फिल्म में उनका किरदार मुस्लिम होता है। साथ ही बैकग्राउंड में मंदिर में ही काले कपड़ों में ‘शैतान’ जैसी आकृति खड़ी दिखाई गई है।

इसे लेकर तब विरोध भी खूब हुआ था, लेकिन इसे दबा दिया गया था। मार्तंड सूर्य मंदिर को ‘शैतान की गुफा’ के रूप में फिल्म में दिखाया गया था।

हिंदू राजाओं का पतन

कार्कोट राजवंश के बाद उत्पल राजवंश के सम्राट अवंतिवर्मन ने कश्मीर पर शासन किया और उनके दौर में भी मार्तंड मंदिर के वैभव को सुरक्षित रखा गया। विदेशी आक्रांताओं की नज़र भारतवर्ष पर थी, फिर 14वीं सदी आते आते हिंदू राजाओं का पतन होना शुरू हो गया और इस पतन का कारण था लोगों का मुस्लिम प्रचारकों पर विश्वास करना।

14वीं सदी की शुरुआत में कश्मीर के शासक राजा सहदेव थे और उनके दो विश्वासपात्र थे – एक थे लद्दाख में बौद्ध धर्म के राजकुमार रिंचन शाह और दूसरे थे स्वात घाटी से आए मुस्लिम प्रचारक सिकंदर शाहमीर। यह उसी काल की बात है जब मंगोल आक्रमणकारी डुलचू ने 70 हज़ार सैनिकों के साथ कश्मीर पर हमला किया और अपनी जान बचाने के लिए राजा सहदेव को जम्मू के किश्तवाड़ जाना पड़ा और डुलचू ने कश्मीर में हिंदुओं को अपना गुलाम बनाना शुरू कर दिया।

हालांकि ऐसा कहा जाता है कि उस समय आई एक प्राकृतिक आपदा में वो अपने कई सैनिकों के साथ मारा गया। मुस्लिम आक्रमणकारियों के लिए कश्मीर पर कब्जा करने का ये बिल्कुल सही समय था और उन्होंने ऐसा किया था।

लद्दाख के राजकुमार रिंचन शाह का विश्वासघात

बड़ी बात ये है कि उस समय कश्मीर के राजा रामचंद्र को सिंहासन से हटाने के लिए शाहमीर ने लद्दाख के राजकुमार रिंचन शाह के साथ मिल कर षड्यंत्र रचा और उन्हें ये लालच दिया कि अगर वो कश्मीर पर कब्जा करने में उनकी मदद करते हैं तो वो सिर्फ लद्दाख के नहीं, बल्कि कश्मीर के भी राजकुमार नियुक्त होंगे। शाहमीर के इस लालच में लद्दाख के राजकुमार फंस गए और राजा रामचंद्र का कत्ल कर दिया गया।

यही नहीं बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने वाले रिंचन शाह का इस कदर हृदय परिवर्तन हुआ कि उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया और अपना नाम रिंचन शाह से मलिक सदरुद्दीन रख लिया और इस तरह वो कश्मीर के पहले मुस्लिम शासक बने। सोचने वाली बात है कि शाहमीर की बातों से प्रभावित होकर उन्होंने बौद्ध धर्म छोड़ दिया और इस्लाम धर्म अपना लिया।

हालांकि इस समय तक कश्मीर में हिंदुओं का ज्यादा दमन नहीं होता था और मार्तंड मंदिर की विरासत भी सुरक्षित थी, लेकिन इस दौरान कोई शाहमीर के षड्यंत्र को नहीं समझा और एक दिन शाहमीर ने लद्दाख के राजकुमार को भी कश्मीर की गद्दी से हटा दिया और उस पर खुद बैठ गया। और इस तरह शाहमीर के वंशजों ने हजारों वर्षों तक कश्मीर पर शासन किया और यहीं से हिंदुओं के धर्मांतरण और मंदिरों को तोड़ने का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ।

हिन्दुओं के सामने रखी गयी तीन शर्तें

वर्ष 1417 में जब सिकंदर जैनुल आबिदीन इस गद्दी पर बैठा तो उसने हिंदुओं के सामने तीन शर्तें रख दीं- पहली शर्त ये थी कि हिंदू इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लें, दूसरी शर्त थी इस्लाम धर्म नहीं अपनाने पर कश्मीर छोड़ कर भाग जाएं और तीसरी शर्त ये थी कि पहली दो शर्तों को नहीं मानने पर मरने के लिए तैयार हो जाएं। और उस समय बहुत से हिंदुओं ने तय किया कि वो मर जाएंगे लेकिन न तो कश्मीर को छोड़ेंगे और न ही इस्लाम धर्म स्वीकार करेंगे।

इसी के बाद कश्मीर में बड़े पैमाने पर मंदिरों को तोड़ा गया और हिंदुओं को इस्लाम धर्म मानने के लिए उनका दमन किया गया। इस नरसंहार के लिए सिकंदर जैनुल आबिदीन को बुतशिकन भी कहा गया, जिसका अर्थ होता है, मूर्तिभंजक, मूर्ति तोड़ने वाला, मूर्ति पूजा का विरोध करने वाला। जैनुल आबिदीन ने मार्तंड मंदिर पर कई बार हमला किया और 15वीं सदी में इस मंदिर को तोड़कर इसमें आग लगा दी गई।

कहा जाता है कि उस समय मंदिर को लकड़ियों से भर दिया गया था और मंदिर दो वर्षों तक जलता रहा था और आज ये मंदिर खंडहर हो चुका है। देश में चलाए जा रहे धर्म परिवर्तन के रैकेट और इतिहास की इस घटना में कुछ और समानताएं भी मिलती हैं।

भारत में मुस्लिम शासन पर कई भागों में राजतरंगिणी नाम से पुस्तकें लिखी गई हैं। इनमें द्वितीय राजतरंगिणी पुस्तक लिखने वाले जोनराज ने इसमें सिकंदर जैनुल आबिदीन के शुरुआती शासन का वर्णन किया है जबकि उनके शिष्य शिरावर ने उनके शासन के अंतिम वर्षों का उल्लेख किया है।

सुहा भट्ट हिंदू से मुसलमान बना

इन किताबों से एक और किरदार के बारे में पता चलता है, जिसका नाम था सुहा भट्ट। सुहा भट्टा पहला हिन्दू था, लेकिन सिकंदर शाहमीर ने उसे अपने राज्य का प्रधानमंत्री बनाने का लालच दिया और इस लालच के बदले उसका धर्म परिवर्तन कराया। बड़ी बात ये है कि सुहा भट्ट हिंदू से मुसलमान बना और शाहमीर के कहने पर उसने कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार किया और जबरन धर्मांतरण करवाया।

इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है. जिस व्यक्ति पर धर्म परिवर्तन का रैकेट चलाने का आरोप है, वो पहले हिंदू था, लेकिन फिर इसने इस्लाम धर्म को स्वीकार किया और अब ये धर्मांतरण का रैकेट चलाता है। 17वीं सदी में फारसी भाषा में लिखी गई एक किताब Tarikh-i-Kashmir में भी हिंदुओं पर हुए दमन और मंदिरों के तोड़े जाने की घटनाएं मिलती हैं।

कश्मीर में ऐसे मंदिरों की संख्या 50 हजार है, जिन्हें पूर्व में तोड़ गया और नुकसान पहुंचाया गया और आज की सरकार इन मंदिरों के पुनर्निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। मार्तंड सूर्य मंदिर का वो गौरवशाली इतिहास फिर से प्रतिस्थापित करना तो असंभव है, पर इस सूर्य मंदिर के पुनरुद्धार से लोगों की आस्था फिर से बहाल हो जाएगी। 

By Vivek Sinha

IT Professional | Techno Consultant | Musician

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