Laghu katha - pachhtava

Laghu Katha in Hindi

लघु कथा – पछतावा 

छुक छुक करती ट्रेन अपनी रफ्तार से बढ़ती ही जा रही थी। स्लीपर के एक डिब्बे में राहुल के समीप बैठी नैना अपनी कल्पनाओं में डूबती -उतरती नए-नए ख्वाबों में खोई थी। कोलकाता जैसे बड़े शहर को उसने कभी ना देखा था। इतने बड़े शहर में राहुल के साथ अपना आशियाना बनाने की खुशी उसके उसके चेहरे से स्पष्ट झलक रही थी।

राहुल का प्यार उसे दुनिया जहान से बढ़कर था, इसलिए तो उसने अपने परिवार का त्याग करने में तनिक भी ना सोचा। उसके कहने पर मम्मी के गहने चुराने में नैना के हाथ जरा भी ना कांपे। इस समय वह इतनी खुश है कि उसे अपने मम्मी-पापा की एक बार भी याद नहीं आ रही “बस राहुल ही राहुल उसके मन -मस्तिष्क पर छाया है”।

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आखिर इंतजार की घड़ी खत्म हुई, गाड़ी हावड़ा स्टेशन पर रुक चुकी थी। गाड़ी के रुकते ही उतरने वालों और चढ़ने वालों का द्वंद शुरू हो गया। हाथ में कपड़े और गहने का थैला लिए राहुल नैना के साथ उतरा और दोनों स्टेशन से बाहर आए। बाहर उनके इंतजार में एक व्यक्ति गाड़ी लेकर खड़ा था, यह देखकर नैना का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसने मन ही मन सोचा “यहां तो राहुल की अच्छी पहचान है”।

गाड़ी एक भवन के सामने आकर रुकी। राहुल ने नैना से कहा, “तुम इसके साथ अंदर जाओ, मैं नाश्ते- पानी का कुछ इंतजाम करके फिर इसी गाड़ी से वापस आऊंगा” कहते हुए राहुल ने जेवर का पैकेट अपने पॉकेट में रख लिया। नैना उस व्यक्ति के साथ भवन में प्रवेश कर गई। उस व्यक्ति ने नैना को बगल की सीढ़ियों से ले जाकर ऊपर की एक कोठरी में आराम करने को कहा और वहां से चला गया। नैना इंतजार में बैठी- बैठी कब सो गई उसे पता ही ना चला।

भरोसे का क़त्ल

लोगों की आहट और चहल-पहल की आवाज से उसकी नींद टूटी, तब उसे ज्ञात हुआ कि अंधेरा हो चुका है। पर अभी भी राहुल का कहीं कोई अता- पता ना था। नैना का हृदय अज्ञात भय से कांपने लगा। बगल के कमरे से तबले की थाप के साथ घुंघरूओं की आवाज उसके कानों में स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी। नैना की समझ में अब सारी बातें आने लगी, वह समझ गई कि अब उसके राहुल ने उसे सचमुच एक नई दुनिया में पहुंचा कर छोड़ दिया है।  नैना के आंसू निकल रहे थे, और उसके पास पछताने के सिवाय कोई चारा नहीं था।

By कुनमुन सिन्हा

शुरू से ही लेखन का शौक रखने वाली कुनमुन सिन्हा एक हाउस वाइफ हैं।

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