Alak Atul in hindi kahani nirnay

Hindi Kahani – निर्णय (भाग 2) स्त्री की मनःस्थति और पुरुष की मनोदशा के अन्तर्द्वन्द में फंसी जिंदगी 

अब तक आपने पढ़ा कि हालात कैसे अलका और अतुल को कई सालों बाद फिर से एक जगह रोक देती है।

पढ़ें  निर्णय भाग 1

जिंदगी अपनी रफ्तार से बढ़ती गई। अतुल को नौकरी मिल गई, घर वालों के दबाव डालने पर उसने शादी भी कर ली। आज उसका एक हंसता खेलता परिवार है, परंतु अलका से मिलने के बाद उसे अपनी गलती पर बार-बार पछतावा हो रहा है, “क्यों उसने उसे प्रतीक्षा करने का आश्वासन नहीं दिया”। अलका इतनी जिद्दी निकलेगी, आजीवन शादी नहीं करेगी इस बात का उसे जरा भी भान न था। उसने सोचा था कि अलका अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई होगी, पर वह तो आज भी अपने निर्णय पर अटल है।

साल बीतते गए अलका अपने आप में निर्द्वन्द जी रही है। उसने आज तक अतुल से कोई शिकायत नहीं की। अभी भी यह वही पुरानी अलका है। परंतु अतुल का मन बार-बार विचलित हो जाता है। कभी उसे अपने आप से ग्लानि होती, कभी अलका को समझा कर उसकी शादी करवाने का विचार आता, तो कभी उसके मन में होता कि वह अपने परिवार, घर गृहस्थी को छोड़कर अलका के पास हमेशा हमेशा के लिए चला जाए। परंतु अतुल अलका से इन विषयों पर बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

बहुत सोचने के बाद अतुल ने आज मन में ठान लिया कि चाहे जो हो वह अलका से इन विषयों पर बात करके ही रहेगा। उसे मना कर ही रहेगा। या तो वह किसी और के साथ शादी करके अपना संसार बसाए या मुझे अपना ले। अलका के प्रेम के सामने उसे अपने घर परिवार, बच्चे, किसी का भी त्याग करना स्वीकार था।

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सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी अलका ने जब दरवाजा खोला तो सामने अतुल को देखकर चकित रह गई। इतनी सुबह! सब ठीक तो है। हां, तुमसे कुछ बातें करनी है, अतुल के शब्दों में अधीरता थी। “ठीक है ठीक है पहले बैठो तो”, कहते हुए कुर्सी की तरफ इशारा किया। आज सुबह की चाय तुम्हारे साथ पीने का आनंद ही कुछ और होगा, कहती हुई अलका किचन में चाय बनाने चली गई। कुछ ही देर में चाय की ट्रे लिए हुए अलका कमरे में वापस आई।

टेबल पर चाय रखते हुए उसने पूछा अब कहो क्या बात है? अतुल भाव विह्वल होकर लगभग रोते हुए बोला”अलका मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है, पर उस भूल की सजा तुम खुद को क्यों दे रही हो, आज मेरी वजह से तुम अकेली हो, मुझे जो सजा देना चाहती हो दो, लेकिन तुम अपने भविष्य की सोचो, जिंदगी दो दिन की नहीं होती हर व्यक्ति को साथी और परिवार की जरूरत होती है, सो तुम शादी करके अपना सुखी परिवार बसाओ। “नहीं अतुल मैं नहीं चाहती मैं खुश हूं” अलका ने कहा। अतुल अलका की कलाई को कसकर पकड़ते हुए भाव आवेश में जोर से बोल पड़ा तो सुन लो मैं सब को छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए तुम्हारे पास आ जाऊंगा, मुझे किसी की रत्ती भर भी परवाह नहीं – यह मेरा अंतिम निर्णय है।

अलका प्रेम पूर्ण शांत भाव से अतुल को निहार रही थी। फिर उसने अतुल को शांत कराया और मुस्कुराती हुई बोली “अतुल तुम फिर एक बार गलत निर्णय ले रहे हो। अपनी पत्नी और बच्चों का ख्याल करो, जिसका एकमात्र सहारा तुम हो। यह सामाजिक बंधन अर्थहीन और भाव शून्य नहीं होते। यह कर्तव्य, प्रेम, त्याग, समर्पण से बंधा है। इसीलिए निर्णय कभी भी केवल भावनाओं में बहकर नहीं अपितु हकीकत की धरातल पर होनी चाहिए।”

“आज सुबह का नाश्ता मेरे साथ यहीं करो” कहकर अलका चाय के कप प्लेट उठाते किचन की ओर मुड़ गयी। अतुल निस्तब्ध हो उसे देख रहा था।

By कुनमुन सिन्हा

शुरू से ही लेखन का शौक रखने वाली कुनमुन सिन्हा एक हाउस वाइफ हैं।

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