Nirnay Hindi Kahani

Hindi Kahani – निर्णय (भाग 1) स्त्री की मनःस्थति और पुरुष की मनोदशा के अन्तर्द्वन्द में फंसी जिंदगी 

अतुल बरसों बाद अपने सामने अलका को देखकर विस्मित हो गया। खुशी के मारे उसके कंठ अवरूद्ध हो रहे थे, एक क्षण को लगा कि उसकी हृदय गति थम गई हो। उसने अपने को नियंत्रित करते हुए अलका से सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। पानी पीकर बोतल को टेबल पर रखते हुए अतुल ने पूछा, “तुम यहां कैसे!” अलका मुस्कुराती हुई बोली, “मेरा तबादला इसी ऑफिस में हुआ है, आज मेरा पहला दिन है”। तुम भी इसी ऑफिस में कार्यरत हो, ये तो बड़ी अच्छी बात है। मुझे तुमसे यहां के कामों के बारे में समझने में सहयोग मिलेगा। यह जगह अभी मेरे लिए नई है, परंतु तुम हो तो मुझे ज्यादा परेशानी नहीं होगी।

अतुल के जी में आ रहा था कि वह ढेर सारी बातें करे, पर ऑफिस में काम का वक्त था, इसीलिए उसने अलका से बाद में मिलने के लिए कह कर वह ऑफिस के कामों में लग गया। अलका अपने स्थान पर चली गई। ड्यूटी समाप्त होने के बाद अतुल अलका के पास गया। अलका भी उसी का इंतजार कर रही थी। तब बताओ तुम्हें यहां आकर कैसा लगा? अतुल ने पूछा। “अच्छा, पर सबसे अच्छी बात जो लगी वह यह कि तुम यहां पर हो, तुम समझ नहीं सकते अतुल कि मैं आज कितनी खुश हूं” कहते हुए अलका की आंखों से खुशी के आंसू छलक गए। “तुम कहां जा रही हो चलो तुम्हें छोड़ देता हूं” कहते हुए अतुल ने अपनी बाइक स्टार्ट कर दी।

अलका का क्वार्टर ऑफिस से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर था। पहुंचकर अलका ने ताला खुला और अतुल को अंदर आने को कहा। अलका तुम यहां अकेली हो! आश्चर्य से अतुल ने पूछा। हां, पापा मम्मी अब नहीं रहे, भाई लोगों की अपनी गृहस्थी है, कौन कब तक किसके साथ रहता है? अलका ने गहरी सांस के साथ ही उत्तर दिया। तो तुमने शादी क्यों नहीं की? हालांकि अलका के शादी ना करने की वजह को अतुल कहीं ना कहीं समझ रहा था। अरे उसने यह क्या पूछ लिया, उसके मन में आया कि वह अपने इस प्रश्न को पेंसिल के लिखावट की तरह मिटा दे, पर वह तो उसकी जुबान से फिसल चुका था। यह उसने क्या किया, कहीं अलका को ठेस ना पहुंचे।

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आज 15 वर्षों के बाद उसका मन फिर एक अनजाने भय से कांप गया “अलका के छोड़ने का है”। शायद अलका ने अतुल की मनोदशा भाप ली। हंस कर बोली कोई मिला ही नहीं। सिर्फ मेरे ही बारे में पूछते रहोगे या अपने बारे में भी बताओगे उसने बड़ी चतुराई से बातों का रुख बदल दिया। हां, जरूर मेरे परिवार में अभी मेरे अलावा मां पत्नी और मेरे दो बेटे हैं। “आंटी तो अब काफी बुढ़ी दिखती होंगी” अलका ने कहा। हां, मां अब ज्यादातर बीमार ही रहती है पर तुम्हें नहीं भूली। तुम्हें देखकर बहुत खुश होगी। ठीक है मैं रविवार को आऊंगी, बातों बातों में चाय का कप कब का खाली हो चुका था।

बातों का सिलसिला रोकते हुए अलका ने कहा,”काफी देर हो चुकी है बाकी बातें फिर कभी होंगी”। अतुल ने अपने घड़ी की ओर देखते हुए कहा सचमुच अब चलना चाहिए। कहकर अतुल ने अपनी बाइक स्टार्ट की। अलका के क्वार्टर से अपने घर तक का सफर पुरानी यादों को दोहराते हुए कब कट गया, अतुल को पता ही ना चला।

अतुल और अलका बचपन में एक ही मोहल्ले में रहकर पले बढ़े थे। दोनों ही परिवार के बीच काफी घनिष्ठता थी। अतुल और अलका की दोस्ती उम्र के साथ बढ़ती गई और इस दोस्ती ने एक दिन ऐसा रूप लिया कि वे एक दूसरे के बगैर अपने जीवन को अपूर्ण समझने लगे। इन दोनों को लेकर मोहल्ले में तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगी। अतुल अपनी और अलका की शादी का निर्णय लेने में असमर्थ था, क्योंकि उस वक्त उसके पास कोई रोजगार नहीं था। वह अपने पिता पर आश्रित था। अलका ने जब अतुल से शादी करने के बारे में बात की, तो उसने उसे कोई आश्वासन नहीं दिया, उसे दूसरी जगह शादी कर लेने को कहा। उस समय अतुल की मनोदशा पिंजरे में बंद पक्षी की तरह थी, उसे कुछ समझ में ना आ रहा था। उस दिन के बाद अलका और उसके परिवार के लोग शहर छोड़कर कहां चले गए किसी को मालूम नहीं।

अतुल ने अलका को ढूंढने की बहुत कोशिश की पर उसका पता ना चला।

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By कुनमुन सिन्हा

शुरू से ही लेखन का शौक रखने वाली कुनमुन सिन्हा एक हाउस वाइफ हैं।

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