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Childhood Games in India

मनुष्य पाषाण युग से निकलकर आधुनिक वैज्ञानिक युग में प्रवेश कर चुका है

आधुनिक युग और खेल बदलाव संसार की मूल प्रवृत्ति है। यह निरंतर चलती ही रहती है। संस्कतियां बदलती हैं, सभ्यताएं बदलती हैं, पीढ़ी दर पीढ़ी यह परिवर्तन हमें देखने को मिलता है। इस बदलाव का ही नतीजा है कि मनुष्य पाषाण युग से निकलकर आधुनिक वैज्ञानिक युग में प्रवेश कर चुका है।

पहले की भांति अबलोगों का जीवन कठिन ना होकर सरल हो गया है। अब मनुष्य को हर तरह की सुख सुविधाएं उपलब्ध है। तकनीकी विकास ने मानव जीवन के हर क्षेत्र में परिवर्तन ला दिया है। विज्ञान ने हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में प्रयुक्त होने वाले बहुत से उपकरण दिए हैं, जिनमें से एक मोबाइल और टीवी भी है। यह एक ओर जहां हमें कई सुविधाएं और मनोरंजन देने का काम करती है, तो दूसरी ओर इस का हमारे जीवन में हावी होना आने वाली पीढ़ी के विकास में अवरोध भी पैदा कर रहा है।

आधुनिकता के कुछ नुकसान भी हैं

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मनोरंजन तो बस मोबाइल और टीवी तक सिमट कर रह गया है

इस बदलते हुए युग में लोग आधुनिक चकाचौंध के पीछे इतने व्यस्त हो गए हैं कि खुद को एक जीता -जागता मशीन बना लिया है।

 

हमारे जीवन में मनोरंजन के लिए या तो समय नहीं है, या है भी तो बस मोबाइल और टीवी तक सिमट कर रह गया है। शहर ही नहीं गांवों में भी इसका असर देखने को मिल रहा है।

 

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खुले वातावरण में खेलकूद (Childhood Games in India)

पहले गांव में बच्चे तो खुले वातावरण में खेलते ही थे, बड़ों के लिए भी मनोरंजन के लिए समय-समय पर कुश्ती, कबड्डी जैसे खेलों का आयोजन होता था। विभिन्न प्रकार के करतब तलवारबाजी, आग के गोले को नचाना, भाला चलाना, लाठी चलाना इत्यादि भी होते थे। इस तरह के करतब का लोग समय-समय पर आयोजन करते थे। मुहर्रम जैसे त्योहार में हिंदू और मुसलमान दोनों ही मिलकर साथ खेला करते थे।

गांव के बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों में गिल्ली -डंडा, कित कित, कबड्डी, खो-खो, छुआछूई, पिट्ठू, चोर सिपाही, लट्टू, विष-अमृत, पतंगबाज़ी, लंगड़ी,अट्ठा- गोटी, पकड़म पकड़ाई जैसे अनेकों खेल शामिल थे, जो अब शायद ही कभी -कभार देखने को मिलता है। इनमें से बहुत सारे खेलों को आज के बच्चे जानते भी नहीं।

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गिल्ली डंडा और पिट्ठू जैसे खेल बच्चे भूलते जा रहे हैं

खेल मनुष्य के उत्पन्न होने के साथ ही प्रकृति से उपहार स्वरूप मिले हैं। बच्चा जब तक खेलता है तब तक उसे कभी भी तनाव नहीं होता है। बच्चे की शारीरिक गतिविधियां उसके शारीरिक एवं मानसिक विकास में मदद करती है। मनुष्य सदा से कर्मशील रहा है चाहे वह आदिमानव हो या आधुनिक मानव।

श्रम करने पर स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है

आदि मानव प्रकृति से जुड़ा हुआ था और शारीरिक कार्य करता था, आधुनिक मानव मानसिक तौर पर ज्यादा व्यस्त रहता है। मानव शरीर की बनावट ही ऐसी है कि वह श्रम करने पर स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है। उसके सभी अंग तंत्र सुचारू रूप से कार्य करते हैं। परंतु मनुष्य के आविष्कारों ने हर कार्य को स्वचालित कर दिया है, जिसके परिणाम स्वरुप मनुष्य को एक गतिहीन दिशा की तरफ धकेल दिया है।

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खो-खो खेलते बच्चे

एक दौर में बच्चे घर से बाहर खुले मैदान में अपने दोस्तों के साथ खेलना पसंद करते थे। वही आज घर में मोबाइल के साथ खेलना पसंद करते हैं। मोबाइल के कुछ खेल जैसे- ब्लू व्हेल, मोमो, साल्ट, आईस इत्यादि बच्चों में निराशा की स्थिति भी उत्पन्न करते हैं जो उनके आत्मविश्वास का अंत करके उनको अनिश्चितता के गर्त में धकेल रहा है।

 

मनुष्य का जीवन बहुत ही महत्वपूर्ण है एक अच्छा जीवन जीने के लिए शरीर का स्वस्थ होना काफी आवश्यक है। इसके लिए मनुष्य को अपनी जीवनशैली में उपकरणों एवं शारीरिक श्रम के बीच सामंजस्य बनाना चाहिए। खेलकूद को अपने जीवन में अवश्य शामिल करना चाहिए जिससे उनका शरीरऔर मस्तिष्क दोनों चुस्त-दुरुस्त रहे और आपसी भाईचारा को भी बढ़ावा मिले। एक स्वस्थ और सुदृढ़ समाज एवं राष्ट्र के विकास हेतु प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य बनता है कि खेलों के प्रति जागरूक हों और अपने बच्चों को भी इस ओर बढ़ावा दें।

By कुनमुन सिन्हा

शुरू से ही लेखन का शौक रखने वाली कुनमुन सिन्हा एक हाउस वाइफ हैं।

One thought on “क्यों दूर हुए जा रहे आजकल के बच्चे देशी खेल कूद से : Childhood Games in India”
  1. वाह वाह, सरवतः ज्ञात सच्चाई को आपने बखूबी लिखा है। इसकी अधिक से अधिक प्रभाव परे ।

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