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Vishwaguru Bharat

भारत विश्व गुरु क्यों कहलाता है

यदि आप भारतवासी हैं तो यह वाक्य “शिक्षा दान महादान” अवश्य ही अपने जीवन काल में कभी न कभी सुना होगा। यह पंक्ति मात्र एक वाक्य ही नहीं, यह हमारी शिक्षा और संस्कृति से जुड़ी प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। विश्व गुरु कहलाने वाला हमारा भारत देश प्राचीन काल से ही शिक्षा और शिक्षण कार्य को पवित्र मानता है। भारत में गुरु का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। जब विश्व के अन्य देश शिक्षा जैसी चीजों से अनभिज्ञ थे, उस वक्त हमारा देश ज्ञान के सागर में गोते लगा रहा था।

सबसे प्राचीनतम युग वैदिक युग (2700 ईसा पूर्व से 900 ईसा पूर्व) में ही तक्षशिला, मिथिला, पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, धारा, तंजोर आदि प्रसिद्ध कई शिक्षण के केंद्र थे। इसी देश में सर्वप्रथम विश्वविद्यालय की संकल्पना का उदय हुआ। प्राचीन काल से ही यहां के अनेक नगरों ने शिक्षा केंद्रों के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की तथा कालांतर में विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुए।

आज से सैकड़ों साल पहले भारत में ऐसे शिक्षा के केंद्र थे, जिनका स्वरूप आज के आधुनिक विश्वविद्यालयों जैसा ही था। आठवीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केंद्र था। गणित शास्त्र, सैन्य शिक्षा, ज्योतिष शास्त्र, भूगोल शिक्षा, विज्ञान के साथ ही अन्य विषयों की शिक्षा देने में भारतीय विश्वविद्यालयों का कोई सानी नहीं था। इन विश्वविद्यालयों में देश ही नहीं विदेशों से भी छात्र अध्ययन करने आते थे।

पूरे भारत में प्राचीन काल में 13 बड़े विश्वविद्यालय थे- नालंदा विश्वविद्यालय, तक्षशिला विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, वल्लभी विश्वविद्यालय, पुष्पगिरी विश्वविद्यालय, ओदंतपुरी विश्वविद्यालय, सोमपुरा विश्वविद्यालय, जगददला, नागार्जुनकोंडा, वाराणसी, कांचीपुरम, मणिखेत और शारदा पीठ।

1) नालंदा विश्वविद्यालय– यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। यह विश्वविद्यालय वर्तमान बिहार के पटना शहर से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर में स्थित था। सातवीं शताब्दी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री हेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरणों में इस विश्वविद्यालय की जानकारी मिलती है।

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नौवीं से 12वीं शताब्दी तक इस विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय ख्याति रही थी। यहां भारत के अलावा चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस, कोरिया, जापान तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 450 से 470 ईसवी में की थी। इस विश्वविद्यालय में 300 से अधिक क्लासरूम थे और यहां टीचर्स के लिए 9 मंजिल की एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी भी थी।

2) तक्षशिला विश्वविद्यालय- यह भारत का सबसे प्राचीनतम विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय का निर्माण 27000 वर्ष पूर्व किया गया था। आज यह विश्वविद्यालय पाकिस्तान में है लेकिन भारत के बंटवारे से पहले यह भारत का सबसे पुराना विश्वविद्यालय था। इसमें विश्व के अलग-अलग कोने से विद्यार्थी पढ़ने आते थे। यहां आयुर्वेद, नीतिशास्त्र, भूगर्भ शास्त्र, सैन्य शिक्षा जैसे 64 विषयों की शिक्षा प्राप्त की जाती थी।

3) विक्रमशिला विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला के बाद भारत का सबसे प्राचीनतम विश्वविद्यालय है विक्रमशिला विश्वविद्यालय। यह बिहार के भागलपुर जिला में स्थित है। इसे बनवाने का श्रेय पाल वंश के राजा धर्मपाल को जाता है। अन्य विश्वविद्यालयों की भांति यहां भी देश विदेश से छात्र पढ़ने आते थे। विक्रमशिला बिहार राज्य का एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है जहां दूर-दूर से सैलानी घूमने आते हैं।

4) वल्लभी विश्वविद्यालय– यह गुजरात में है। इसका निर्माण 470 ईसवी के आसपास हुआ। इस विश्वविद्यालय की इमारत बेहतरीन कला का उदाहरण मानी जाती थी, जो धीरे-धीरे नष्ट होती चली गई। यहां आज भी सैलानी घूमने आते हैं।

5) पुष्प गिरी विश्वविद्यालय– यह विश्वविद्यालय भारत के उड़ीसा राज्य में स्थित है। इसका निर्माण लगभग तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक द्वारा करवाया गया था। लगभग 700 से 800 सालों तक यह भारत में शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा था।

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पुष्पगिरी विश्वविद्यालय उड़ीशा का एक प्राचीन विश्वविद्यालय था PC- arungovil.in

6) ओदंतपुरी विश्वविद्यालय– यह विश्वविद्यालय मगध यानी बिहार में स्थापित किया गया, इसकी स्थापना पाल वंश के राजाओं द्वारा की गई। आठवीं शताब्दी के अंत से 12वीं शताब्दी तक लगभग 400 सालों तक इसका विकास चरम पर था।

7) सोमपुरा विश्वविद्यालय– सोमपुरा विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजाओं ने किया था। इसे सोमपुरा महाविहार के नाम से पुकारा जाता था। आठवीं से 12वीं शताब्दी तक 400 सालों तक काफी प्रसिद्ध था। 27 एकड़ में फैला यह विश्वविद्यालय विश्व में बौद्ध शिक्षा का सबसे अच्छा केंद्र माना जाता था।

8) जगददला विश्वविद्यालय- यह विश्वविद्यालय भी नालंदा विश्वविद्यालय की ही परंपरा पर आधारित था। प्रसिद्ध कश्मीरी विद्वान शाक्य श्री भद्र जो नालंदा विश्वविद्यालय के अंतिम विद्वान थे उन्होंने नालंदा, विक्रमपुरी, ओदंतपुरी विश्वविद्यालय के ध्वस्त होने के बाद यहां प्रवेश लिया था। इस विश्वविद्यालय के समाप्त होने का अनुमान 1207 इसवी लगाया जाता है। इससे 1999 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल करने के लिए अस्थाई स्थल के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

9) नागार्जुनकोंडा विश्वविद्यालय– आंध्र प्रदेश राज्य के नल गोंडा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है। हैदराबाद से 100 मील दक्षिण -पूर्व की ओर स्थित नागार्जुनकोंडा एक प्राचीन स्थान है। यह स्थान बौद्ध शिक्षा का एक केंद्र था। नागार्जुनकोंडा से प्राप्त अभिलेखों से यह ज्ञात होता है कि पहली शताब्दी ईस्वी में भारत का चीन, यूनानी जगत तथा लंका से संबंध स्थापित था।

10) वाराणसी विश्वविद्यालय- उत्तर प्रदेश में (8वीं से आधुनिक काल तक) ब्रह्म ज्ञानी राजा अजातशत्रु के समय वाराणसी उपनिषद के ज्ञान के लिए विख्यात था। महात्मा बुध के समय काशी पूर्वी भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक केंद्र था इसलिए उन्होंने यहां बौद्ध शिक्षा और धर्म के प्रचार का केंद्र बनाया जो सारनाथ के नाम से जाना गया। लगभग 12 वीं सदी ईसवी तक सारनाथ बौद्ध शिक्षा के केंद्र के रूप में क्रियाशील रहा। यहां नालंदा विश्वविद्यालय की तरह सुव्यवस्थित शिक्षा संस्था नहीं थी, सुयोग्य शिक्षकों द्वारा व्यक्तिगत रूप से अपना अपना विद्यालय चलाया जा रहा था। मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के बाद लगभग सभी विश्वविद्यालयों का खात्मा हो चुका था बनारस की शिक्षा व्यवस्था पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ा फिर भी बनारस शिक्षा केंद्र के रूप में अपना अस्तित्व किसी न किसी प्रकार बनाए रहा।

11) कांचीपुरम विश्वविद्यालय– यह तमिलनाडु में स्थित था। इतिहास में इसके संबंध में बहुत जानकारियां उपलब्ध नहीं है परंतु ऐतिहासिक, इमारती खंडहरों और मूर्तियों के प्राप्त अंश को देखकर यह ज्ञात होता है कि प्राचीन में यहां शिक्षण के संस्थान स्थापित थे।

12) मणी खेत विश्वविद्यालय– यह कर्नाटक में स्थित था। बौद्ध धर्म के उदय के साथ ही देश के विभिन्न भागों में मठों, विहारों और विश्वविद्यालयों का निर्माण हुआ। यह विश्वविद्यालय उन्हीं में से एक था।

13) शारदा पीठ विश्वविद्यालय– 724 से 760 ईसवी तक “शारदा पीठ” देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर हुआ करता था। कुषाण साम्राज्य के दौरान यह शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में शारदा के निकट किशनगंगा नदी (नीलम नदी) के किनारे स्थित है। इसके भग्नावशेष भारत-पाक नियंत्रण रेखा के निकट स्थित है।

 

इन प्रमाणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत प्राचीन काल से ही शिक्षा एवं पठन-पाठन कार्य के लिए प्रसिद्ध था, यहां की गुरुकुल परंपरा प्राचीन काल की ही देन है, वैदिक काल से लेकर बौद्ध काल तक भारत की शिक्षा व्यवस्था काफी विकसित थी। यहां कई विश्वविद्यालयों का निर्माण हो चुका था।

मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के बाद हमारे इन प्राचीन धरोहरों को नष्ट किया जाने लगा, यहां की शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद किया गया। बख्तियार खिलजी जैसे शासक ने वैदिक और बौद्ध कालीन शिक्षा व्यवस्था का समूल नाश करने का प्रयास किया, जिसका नतीजा यह है की वर्तमान में मात्र उनके भग्नावशेष ही बचे हैं। 

आप गर्व कीजिये कि आपके पूर्वजों ने आपके लिए एक भव्य विरासत छोड़ गए हैं। हर भारतीय की यही चाह है कि भारत एक बार फिर से विश्व गुरु बन जाये।

By कुनमुन सिन्हा

शुरू से ही लेखन का शौक रखने वाली कुनमुन सिन्हा एक हाउस वाइफ हैं।

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