vidyapati

Vidyapati ka jivan parichay

कवि विद्यापति को कवि कोकिल कहा जाता है 

मैथिल कवि कोकिल के रूप में प्रसिद्ध कवि विद्यापति का भारतीय साहित्य में एक अलग ही पहचान है। यह आदिकाल के कवियों में एक सुप्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। कवि विद्यापति तुलसी, सूर, मीरा सभी से पहले के कवि हैं। अमीर खुसरो यद्यपि इन से पहले हुए थे। कवि विद्यापति बड़े ही मधुर स्वरों में काव्य पाठ करते थे, इसीलिए इन्हें कवि कोकिल की उपाधि दी गई।

इनका जन्म बिहार राज्य के मधुबनी जिला के बिसपी नामक गांव में गणपति ठाकुर नाम के एक राजदरबारी ब्राह्मण के यहां हुआ। इनकी माता का नाम हांसिनी देवी था। कवि विद्यापति के जन्म तथा मृत्यु के साल का कहीं कोई निश्चित लिखित वर्णन नहीं है। इनका जन्म लगभग 1350 से 1374 ईसवी के बीच हुआ तथा इनकी मृत्यु काल 1440 से 1460 ईसवी माना जाता है।

शिव, विष्णु और शक्ति तीनों की आराधना करते थे महाकवि

विद्यापति भारतीय साहित्य की “श्रृंगार -परंपरा” के साथ साथ “भक्ति-परंपरा” के प्रमुख स्तंभों में से एक और मैथिली कवि के रूप में जाने जाते हैं। इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरूप का दर्शन किया जा सकता है। इन्हें वैष्णव (विष्णु के उपासक), शैव (शिव उपासक), शाक्तभक्ति (देवी की भक्ति) के सेतु के रूप में भी स्वीकार किया गया है।

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कवि विद्यापति राजा कीर्ति सिंह और शिव सिंह के दरबारी कवि थे, इसीलिए उनकी रचना कीर्ति पताका और कीर्ति लता में राजाओं के वीरता का गुणगान भी किया गया है। अतः कवि की रचनाओं में श्रृंगार रस और भक्ति रस के साथ वीर रस का भी समन्वय है। मिथिला के लोगों को “देसिल बैना सब जन मिट्ठा”, यानी अपनी भाषा सबको प्रिय होती है, का सूत्र देकर इन्होंने उत्तरी बिहार में लोक भाषा की जनचेतना को जीवित करने का महान प्रयास किया है। मिथिलांचल के लोगों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार रस और भक्ति रस में पगी रचनाएं जीवित हैं।

विद्यापति जी संस्कृत के अलावा मैथिली भाषा में भी खूब लिखे 

कवि विद्यापति की कविताएं संस्कृत, अवहट्ट (संस्कृत का अपभ्रंश), और मैथिली तीन भाषाओं में मिलती है। अतः इनकी रचनाओं को 3 वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

1) संस्कृत रचनाएं – शैवसर्वस्वार, दुर्गम भक्त तरंगिणी, पुरुष परीक्षा, भू परिक्रमा, गोरक्ष विजय, लिखनावली आदि

2) अवहट्ट या देसिल बैयना- कीर्ति लता (1403 ई), कीर्ति पताका (1403 ई)

3) मैथिली- पदावली

कीर्ति लता और पदावली इनकी अमर रचनाएं हैं। जिनसे इन्हें काफी प्रसिद्धि मिली। पदावली में कवि ने कृष्ण-राधा के श्रृंगार रस का वर्णन किया है। इसके आधार पर कवि विद्यापति को श्रृंगारी काव्य के जन्मदाता के रूप में जाना जाता है।

शिव, विष्णु और शक्ति तीनों की आराधना करते थे महाकवि

कवि विद्यापति के भक्ति रस की रचनाओं में शिव और अन्य देवताओं के अलावा गंगा, दुर्गा, गौरी जैसी अनेक देवियों का भी वर्णन है। कवि विद्यापति के शिव भक्ति से संबंधित एक दंतकथा यह भी है- जब कवि विद्यापति वृद्धावस्था में पहुंचे तो उन्होंने राज दरबार जाना कम कर दिया और घर पर ही रह कर रचनाएं करते थे। उनको भगवान शिव से अगाध प्रेम था। एक दिन भगवान शिव स्वयं उगना नौकर का वेश धरकर उनके पास आए और उनके यहां नौकरी करने लगे। कुछ समय बीतने पर एक दिन राज दरबार से कवि विद्यापति के लिए बुलावा आया। अगले दिन होकर कवि विद्यापति अपने नौकर उगना के साथ राज दरबार के लिए चल पड़े।

विद्यापति का शिव प्रेम और उगना पर लोककथा  (Vidyapati ka Jivan Parichay)

रास्ता सुनसान और जंगलों वाला था, कवि विद्यापति को अचानक बहुत जोरों की प्यास लगी, उनसे एक कदम भी चल पाना मुश्किल हो रहा था। तब वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गए और उगना से कहा, “उगना अब मुझ से चला नहीं जाता मेरे कंठ सूख रहे हैं, यदि शीघ्र ही जल ना मिला तो मैं मर जाऊंगा।” उगना ने थोड़ी दूर जाकर एक वृक्ष की ओट में अपनी जटा से कमंडल में गंगाजल भरा और शीघ्र ही कवि विद्यापति के पास आकर उन्हें पानी पीने को दिया। पानी पीने के बाद कवि विद्यापति को आश्चर्य हुआ कि इस सुनसान जगह पर इतनी जल्दी उगना ने पानी कहां से लाया? और इसका स्वाद गंगाजल जैसा है? जबकि कहीं आसपास यहां गंगा नदी नहीं बहती है। कवि के बहुत जिद करने पर आखिर भगवान शिव को उन्हें अपनी असलियत बतानी पड़ी। लेकिन भगवान ने विद्यापति से यह वचन लिया कि वह इस बात को गुप्त रखेंगे किसी से भी नहीं बताएंगे अन्यथा वह उन्हें छोड़कर उसी समय चले जाएंगे।

दोनों भक्त भगवान एक साथ खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक दिन कवि विद्यापति की पत्नी क्रोधित होकर उगना को झाड़ू से पीटने लगी। उसी वक्त विद्यापति जी के मुख से यह बात निकल गई कि वह जिसे मार रही है वह साक्षात भगवान शिव हैं। इस भेद के खुलते ही भगवान शिव उसी समय वहां से चले गए। विद्यापति उनकी खोज में भटकते भटकते उसी स्थान पर पहुंचे, जहां अभी विद्यापति धाम स्थित है। यह स्थान समस्तीपुर जिला के दलसिंह सराय अनुमंडल से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर वर्तमान में विद्यापति नगर के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर कवि विद्यापति को शिव के पुनः दर्शन हुए।

यहां से मात्र 2 से ढाई किलोमीटर दक्षिण दिशा में गंगा नदी उस वक्त बहती थी, मां गंगा का कवि विद्यापति ने आवाहन किया और कहा मुझसे अब चला नहीं जाता आप ही मेरे पास आकर मेरा उद्धार करो। उनकी प्रार्थना पर मां गंगा ही उनके समीप आई और कवि विद्यापति जी ने इसी स्थान पर अपने शरीर का त्याग किया। इसी कारण से इस स्थान का नाम विद्यापति नगर रखा गया। वर्तमान में यह स्थान विद्यापति धाम के नाम से प्रसिद्ध है।

मिथिलांचल की जीवन शैली में रचे बसे हैं विद्यापति

कार्तिक त्रयोदशी को उनका अवसान हुआ था। कवि विद्यापति मिथिला संस्कृति में लोकदेवता की तरह है, यही कारण है कि उनके मृत्यु दिवस यानी बरसी पर देश भर में विद्यापति पर्व मनाया जाता है। विद्यापति की भाषा आम, सहज, सरल होने के साथ गेय धर्मिता वाली है, इसमें राग-लय-ताल सब है।

उनका लिखा गीत ‘जय-जय भैरवी असुर भयाउनी’ के बिना शायद ही मिथिला का कोई आयोजन, कोई समारोह होता है। आज भी मिथिला में देवी वंदना हो, शादी-विवाह हो, पर्व-त्योहार हो, मधुश्रावणी हो, विद्यापति के गीत ही जुबान पर होते हैं।

लोक गायिका शारदा सिन्हा का गाया विद्यापति जी का यह गीत सुनें –

By कुनमुन सिन्हा

शुरू से ही लेखन का शौक रखने वाली कुनमुन सिन्हा एक हाउस वाइफ हैं।

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