Indian Parliament House

संसद भवन डिजाइन 

भारत को जल्द ही एक नया संसद भवन मिलने वाला है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने नए संसद भवन का शिलान्यास किया। ये नया संसद वर्तमान संसद भवन से बड़ा भी होगा और उसका आकार भी गोलाकार न होकर त्रिभुजाकार होगा।

New Sansad Bhavan and old Sansad bhavan
निर्माणाधीन नया संसद भवन पुराने संसद भवन के समीप

वर्तमान संसद भवन का निर्माण 1921 से 1927 के बीच हुआ था। 1927 में इसका उद्घाटन भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने किया था। भवन का निर्माण अंगेजों ने दिल्ली में नई प्रशासनिक राजधानी बनाने के लिए किया था। आजादी के बाद यह संसद भवन बन गया,और इसके शिलान्यास के ठीक 100 साल बाद इसके प्रतिस्थापन पर काम शुरू होगा।

आज की संसद तब विरासत का एक टुकड़ा होगी। नए संसद भवन के डिजाइन के बारे में बहुत कुछ बताया जायेगा, परन्तु वर्तमान संसद के डिज़ाइन के बारे में बहुत कुछ अनकहा रह गया है। वर्तमान संसद भवन के डिज़ाइन का मूल सिद्धांत कहाँ से आया है, इसके पीछे एक दिलचस्प तथ्य है और जिसके लिए हमें मध्य प्रदेश के मुरैना शहर में जाना होगा।

संसद भवन (इंडिया पार्लियामेंट हाउस) का डिजाइन Chausath Yogini Temple Parliament
वर्तमान ब्रिटिश-काल की संरचना सर एडविन लुटियन और हर्बर्ट बेकर द्वारा डिजाइन की गई थी, ये वही आर्किटेक्ट थे जिन्होंने नई दिल्ली की भी योजना बनाई थी। संसद के डिजाइन में सबसे उल्लेखनीय 144 स्तंभ हैं। वास्तुकला में भारतीय स्पर्श में फव्वारे, बालकनियों और संगमरमर की जालीदार स्क्रीन का उपयोग शामिल है। इमारत बड़े उद्यानों से घिरी हुई है, और परिधि को बलुआ पत्थर की रेलिंग से बंद किया गया है।

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लेकिन जो सबसे दिलचस्प बात है, वह यह कि संसद भवन मध्य प्रदेश के एक मंदिर से अगाध समानता रखता है। इतना अधिक कि लोग (और कुछ विशेषज्ञ) जिन्होंने भी इस मंदिर को देखा है, आश्वस्त हैं कि यह मंदिर भारत के संसद भवन के डिजाइन के लिए प्रेरणा के रूप में लिया गया होगा।

लोकतंत्र का मंदिर एक हिंदू मंदिर से प्रेरित है? 

ग्वालियर से करीब 40 किलोमीटर दूर , मुरैना जिले के मितावली गाँव में चौसठ योगिनी मंदिर है, जिसका निर्माण कच्छपघट राजा देवपाल (1055 – 1075) द्वारा किया गया था, कहा जाता है कि मंदिर सूर्य के गोचर के आधार पर ज्योतिष और गणित में शिक्षा प्रदान करने का स्थान था। यह गोलाकार मंदिर है भारत में गोलाकार मंदिरों की संख्या बहुत कम है यह उन मंदिरों में से एक है। यह एक योगिनी मंदिर है जो चौंसठ योगिनियों को समर्पित है।

chausath yogini temple top view
chausath yogini temple top view

भगवान शिव को समर्पित मंदिर लगभग 100 फीट ऊंचे एक अलग पहाड़ी के ऊपर स्थित है। इसकी स्थापत्य शैली पर एक नज़र दो इमारतों (मंदिर और वर्तमान संसद भवन) के बीच समानता को स्पष्ट कर देगा – वे दोनों संरचना में सर्कुलर हैं जिनकी बाहरी दीवारें और एक केंद्रीय कक्ष में खंभे हैं।

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chausath yogini temple similarity sansad bhavan
chausath yogini temple similarity sansad bhavan

संसद भवन और चौसठ योगिनी मंदिर में समानता:
चौसठ योगिनी मंदिर 101 खंभों पर और संसद भवन 144 मजबूत स्तंभ पर टिका है. दोनों ही गोलाकार संरचना के हैं. चौसठ योगिनी मंदिर में 64 कक्ष हैं, संसद भवन में 340 कक्ष. जिस तरह चौसठ योगिनी मंदिर के बीच में एक विशाल कक्ष है, जिसमें बड़ा शिव मंदिर है उसी तरह संसद भवन के बीच में विशाल हॉल है।

स्पष्ट समानता और लोकप्रिय धारणा के बावजूद कि चौसठ योगिनी मंदिर वास्तव में भारत के संसद भवन के लिए प्रेरणा श्रोत है , ऐसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं है कि ब्रिटिश आर्किटेक्ट लुटियन या बेकर मुरैना का दौरा किया करते थे, या यह कि उनका डिजाइन मंदिर से प्रेरित था। भारत की संसद की आधिकारिक वेबसाइट भी मंदिर को डिजाइन प्रेरणा के स्रोत के रूप में स्वीकार नहीं करती है।

 

 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक, नार्थ (2012) केके मुहम्मद द्वारा पुष्टि

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक, नार्थ (2012) केके मुहम्मद का मानना है कि दोनों संरचनाओं के बीच समानता को नजरअंदाज किया जाना अकल्पनीय है। मुहम्मद इस क्षेत्र के कुछ मंदिरों को बहाल करने के लिए एक परियोजना के प्रभारी थे। पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि संसद भवन का डिजाइन वृत्ताकार चौसठ योगिनी मंदिर से प्रेरित था। उन्होंने कहा कि हालांकि, इतिहासकारों को मामले पर विभाजित किया गया है।

लगभग 700 साल पहले, 1323 में, जब राजा देवपाल के शासन में मंदिर का निर्माण किया गया था, किसी ने भी कल्पना नहीं की होगी कि लुटियन “भारतीय लोकतंत्र के मंदिर” पर इस मंदिर के स्थापत्य सौंदर्य का सटीक चित्रण करेंगे। उन्होंने कहा कि संसद की दीवारों पर उकेरे गए वैदिक मंत्रों का अर्थ है कि ब्रिटिश वास्तुकारों ने इमारतों का निर्माण करते समय भारतीय कला को ध्यान में रखा था।

इतिहासकारों द्वारा ऐसे तथ्य भले ही न बताये जाते हों, पर भारत आर्किटेक्चर के क्षेत्र में सदैव अग्रणी रहा है।

By Vivek Sinha

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